कोरोना काल

काम नहीं है अब तो कोई क्यों न इक काम किया जाए।
करते है जो काम, क्यों न उन्हें ही बदनाम किया जाए॥

प्रशासन कुछ भी न कर पाए चलो माना वह वाजिब है।
कमाई की तिहाई देने वालो से क्यों न उम्मीद किया जाए॥

जान का जोख़िम है माना, उसमे भी भला बुराई है कोई क्या ।
सेवा करने ही पढ़े थे ना, क्यों न मुफ़्त में उपचार लिया जाए॥

जला दी चाहे पूरी बस्ती, मगर अब चिनगारी तक न सहा जाए।
क्यों न भूख से तड़प रहे है जो, उनसे ही भुगतान लिया जाए॥

अमृत है अनमोल, बांट उसकी कीमत क्यों कम की जाए।
क्यों न उसे कूड़े में फैंक सबको तड़पने दिया जाए॥

By Hasit

Software Engineer. Self-proclaimed gopher and philosopher. Just another Homo sapiens (Turing test is scheduled) who thinks he can write (to be honest, I seriously doubt it).

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