कुछ यूँ ही

क्या करेगा जान पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान, पौधे को गमले तक ही सीमित रहना है।

Sep 19, 2021

पानी के बहाव सा था रिश्ता अपना, अंत तक आते आते थम सा गया है।
गलतियां ही गलतियां दिखने लगी है, एहसासों को बर्फ जम सा गया है॥

Sep 15, 2021

कोई मंजिल के लिए रास्ता बदलता है, कोई रास्ते के लिए मंजिल।
किसी के लिए बदल सको जब दोनो, समझ लेना मिल गए है दिल॥

Sep 6, 2021

झुर्रियां भी खुबसूरत लगती है जब आती है मां की याद,
खुबसूरत नक्शा छोड़ जाती है नदियां सूख जाने के बाद।

Sep 3, 2021

इक मंज़िल पाकर अगली ढूंढने ही लगते है लोग,
हमराही की तलाश थी, हम उनकी मंज़िल निकले।

Aug 28, 2021

कौन है जो कहते है कहानियां सच नही होती,
लोग अब पौधे को पेड़ बनता भी नही देख पाते क्या ?

Aug 24, 2021

जरूरी नहीं की धनुष हर बार दिखे आसमां में,
कुछ लोग बारिश में फिर भी बस भीगते रहते है।

Aug 24, 2021

हमें तुमसे भला अब कोई शिकवा कैसा, राहगीर कभी कुत्तों को काटा नही करते। बाइज्जत बरी भी कर देते हम तो मगर, इज्ज़त को रुसवा भी किया नही करते॥

Aug 18, 2021

मंज़िल लेकर जो निकला, बीच रास्ते ही खो गया।
बेफिक्र घूमने चला जब, सफर मुकम्मल हो चला॥

Aug 14, 2021

अब हमसे चला नहीं जाता, छांव ढूंढना जरूरी है।
छाले भी तो मिले है, बादल से बादल तक चलते॥

Jul 24, 2021

समंदर पर चल देते खुदा समझ बैठे थे हम तो उन्हें,
वह मेरे अल्फाजों की गहराई ही नहीं थे समझे ।

Jul 12, 2021

छोड़ गए कहकर, किसी दोस्ती के काबिल ही नहीं है हम,
कैसे बतलाता उन्हें, तन्हाई बचपन से ही दोस्त है हमारी।

Jul 12, 2021

अब हर बात समझाई जाए यह भी तो जरूरी नहीं,
जतानी हो वो हर इक बात कही जाए, जरूरी नहीं।

Jul 12, 2021

अब नया तो भला क्या ही लिखूं मैं, आज खबर इक आई थी,
नई सुरंग मिली है घर से थोड़ी ही दूर।

Jul 11, 2021

अमृत इकठ्ठा करता चला था कुछ नारियल की तरह,
टूटकर बह गया जब पानी, पानी पे बेराह बहता मिला।

Jul 11, 2021

“मां, भंवरा कितना बुरा है ना, कभी कभी काटता भी है हमें और फूल से अमृत चुराकर उसे मुरझा देता है।”

“पहले मेरी बात सुन ले, आज खेलने जाए तो पेड़ पे पके आम दिखे तो तोड़के ले आना, वरना बिगड़ जाएंगे। और रास्ते में कुत्ते पीछा करे तो पत्थर मारकर भगा देना। याद रह गया ना, भूल मत जाना। … हां, अब बोल, क्या पूछ रहा था?”

Jul 11, 2021

कसूर यह था कि राह ढूंढने में गवां दी ज़िंदगी,
चलता रहता अगर, आज इक नया रास्ता होता॥

Jul 8, 2021

गलतियां खुद की भूलाकर रूह अब बेपरवाह सोती है।
अब तो मेरी खुदगर्जी भी लोगों की भलाई में होती है।

Jun 6, 2021

सुना था रंगों की नगरी में कत्ल या तस्करी नही होती।
वह दवाईयां रंगीन थी, जो ज़िंदगी के रंग चुरा ले चली॥

Jun 5, 2021

नाकामी का मतलब ये तो नहीं की कभी भी काम नही होगा।
बारिश में पहले भी भीगे हो तो क्या कभी जुकाम नही होगा ?

Jun 2, 2021

ज़िंदगी की नाकामियों ने कुछ इस तरह घेरा था।
लगी थी आग दिल में, फिर भी सिर्फ अंधेरा था॥

Jun 2, 2021

हंसी के मुखौटे लिए बैठे, छोटी इक खुशी को तरसे ।
समंदर किनारे चातक सोचे, काश इक बुंद तो बरसे ॥

May 30, 2021

अब बारिश खत्म होने ही वाली है, चलो थोड़ा नमी भर ले।
कुछ ज्यादा ही मुकम्मल है रात, चलो चांद की कमी भर ले॥

May 25, 2021

कल तक बात आवाज़ की थी,
आज सांसें ही खामोश हो चली।

Apr 26, 2021

खुशी की बात हंसकर कह पाओ यह जरूरी तो नहीं,
क्या पता उसके पीछे छिपा कोई दुखद समाचार हो,
कोई बेड नही था, पर अभी एक खाली हो जाएगा,
उस परिवार को बताऊं कैसे, जिसमें मरीज़ चार हो?

Apr 25, 2021

अपनों को देने की चाहत में, अपना वक्त बर्बाद कर बैठे,
और जो अपने थे, वह वक्त कहीं और ही दिए बैठे थे।

Apr 24, 2021

कभी कभी सोचता हूं, इंतकाम के वक्त क्या पूछा जाएगा?
दुनिया को क्यों समझ नही पाया या समझा क्यों नही पाया?

Apr 4, 2021

सो गया जग सारा, कुछ अरमान बाकी है।
कर चुका हूं सब हवाले, सिर्फ जान बाकी है।

March 20, 2021

शायद मैंने कभी बताया ही नहीं जो जताना चाहता था,
शायद जताया नहीं जो दिल मेरा बताना चाहता था ।
समझने लगा था कि तुम हो अब सिर्फ मेरे हिस्से में,
कमबख्त भूल गया था कि लोग जूठा तक खा लेते है।

Mar 17, 2021

परिचय तो क्या दूं मेरा, नाम पहले से बदनाम निकला।
समझा ज़िंदगी ही है बेरंग, मैं खुद रंग श्याम निकला॥

Mar 6, 2021

आज हमारी ही गली को वैसे उजड़ते देख लिया,
जिन गलियों से दूर से ही मुड़ जाया करता था।
चलो आज ज़िंदगी ने यह भी सीखा ही दिया,
जिस तजुर्बे के न होने का गुमान किया करता था॥

Mar 5, 2021

चलो, इक और ज़िंदगी बर्बाद कर चला,
इक और बददुआ अपने नाम कर चला ।
खुद की गलती का ग़म खुद क्यों सहे,
वक्त को बुरा कहकर अपना काम कर चला ॥

Feb 16, 2021

तुम ठहरे इश्क़ का समंदर, मैं नन्हा बादल प्यार का,
तुम्हें महसूस तक न होगा, मेरा तुम पर बरस जाना।

Jan 20, 2021

ज़िंदगी छीन गई मच्छर की, और मेरी,
कोई और था जो ज़ख्म दे गया था।

Jan 20, 2021

शायद तुम्हे उतना नहीं चाहता, जितना कहानियां चाहता हूं।
मगर जानता हूं तुम्हें तुमसे ज्यादा, क्योंकि कहानियां जानता हूं।

Jan 20, 2021

जीवन बचपन की पृष्ठभूमि में कर्म से उभर रहा चित्र होता है ।
छोटीसी भूल छुपाने में चित्रकार अक्सर तस्वीर बिगाड़ लेता है॥

Jan 18, 2021

गिरते ही रहते है अब तो, मोबाईल हो या फिर दिल,
छोटी सी खरोच भी पहले आह निकाल जाती थी ।

Jan 17, 2021

पूरी दुनिया का साथ पाने का सपना था बचपन में,
खुद की नींद और काया भी साथ नहीं जुटा पाया हूं।

Jan 16, 2021

नसीहत गिरते पत्थरो को रुकने की, मूर्ख ही देता है,
बारिश की बूंदों को भी अपने अंजाम का पता होता है।

Dec 27, 2020

दो मिनट बताकर आते ही नहीं, कहीं तुम्हारा नाम भी नींद तो नहीं?

Dec 8, 2020

अरे खुद ही बुला लो, देखो कि कब आती है,
आयी है जब भी, अपनी फ़ुरसत से ही आती है ।

हर बार कोई नया किस्सा, नई कहानी,
या फिर वाकया पुराना, नयी जुबानी ।
वह सज धज के जब चली आती है,
खयाल होती है, सोच बन जाती है ॥

Dec 8, 2020

पत्थर दिल होना तो कोई बहाना नहीं है इश्क़ न करने का,
हम वो है जो पत्थर को भी मूरत बनाकर रखते है।

Nov 25, 2020

गुलदस्ता और कागज़

आख़री अलविदा दोबारा कहने का मौका, हमें भी तो कभी दे देना ए ज़िंदगी,
पेड़ को मरने के बाद भी कभी, फूलों से मिलना नसीब होता है।

Nov 25, 2020

आज सूंघते तक नहीं जो हमें अपनी दवाई माना करते थे,
हम पुराने हो चुके या अब ज़रूरत नहीं, बता देते तो अच्छा होता।

Nov 19, 2020

शायद जुदाई भी सह लेता था यह दिल,
गर वह सपने, यादें और वादें न दिए होते।

Oct 28, 2020

माफ़ी तो अब क्या मांगुं, कोई फ़ायदा नहीं, तुम्हारी ज़िंदगी में आना ही नहीं चाहिए था। सच है, जिन्हें कहां जाना है पता नहीं होता, दूसरों के रास्ते में भी रुकावट बन जाते है॥

Oct 19, 2020

हज़ारों पकवानों और पैसों से भी मिटती ही नहीं,
जो किस्सों और सपनों से मिट जाया करती थी कभी,
दोस्ती ही थी पेट भर जाता था जिससे,
मिट गई ख़ुद, भूख़ मिटाने के इस सफ़र में।

Oct 10, 2020

तरसा मैं जिंदगीभर, ठुकराकर जो मेरे हक का नहीं था।
तुम बारिश की तरह आए, नदियों से पानी चुरा कर ॥

Sep 19, 2020

मेरा शीशमहल देख भी अब्बू के चेहरे पर खुशी न दिखी,
काश अपने देश में ही कोई अफसाना सुना दिया होता।

Sep 11, 2020

बचाए रखा हमने उन को अतीत के अंगारो से,
और वो समझे, मेरी ज़िंदगी में कोई आफताब नहीं।

Aug 30, 2020

कठिन गर न होता ज़िंदगी का वह रास्ता, कैसे जानता की मुमकिन है और रास्ते कई। और गर नाकाम न होता उन हर रास्तों पर, कैसे जान पाता कि पहला ही था सही॥

Aug 30, 2020

मुखौटे का इल्ज़ाम न रखो, नकल ही असलियत है मेरी।
खुद को ढूंढ़ने की कोशिश में, निकली है ज़िंदगी मेरी॥

Aug 30, 2020

न जाने किस बात का गुरूर रखते है कुछ लोग,
मौत भी ज़िन्दगी में इक बार गले लगा जाती है।

Jun 26, 2020

शायद किसी तरह ढूंढ़ ही लेता, मालूम होता गर कि खोया क्या है ।
कौन मालिक है नहीं जानता, कैसे बताऊं क्या खोजा, चुराया क्या है ॥

Jun 7, 2020

समझाता मैं तुम्हें फर्क घाव और ठोकर का, काश तुम पत्थर न होते।

Jun 5, 2020

तेरी बारिश में आख़िरी बूंद तक भीगा,
मैं मासूम कागज़ उसे प्यास समझ बैठा।

Jun 5, 2020

अब तो बहुत ज्यादा खुशी से भी डर लगने लगा है,
चांद को ग्रहण सिर्फ पूर्णिमा को लग सकता है।

Jun 4, 2020

फासला था काफी, नज़र थी रास्ते पे, मंज़िल की जो तलाश थी,
मुड़कर न देखना मुनासिब होता, देखा तो बस लाश ही लाश थी।

Jun 2, 2020

आज़ाद होने के लिए आबाद होना जरूरी तो नहीं,
मैंने अक्सर अमीरों को कमरों में बंद देखा है ।

Jun 1, 2020

ज़िंदगी कुछ और होगी गर चलता रहा,
मैं बस पुरानी बातों को याद करता रहा,
रात मुझे अपने आगोश में ले चुकी थी,
पर मैं बस नींद का इंतज़ार करता रहा।

May 31, 2020

मंज़िल की उतनी परवाह नहीं, इक दिन मिल ही जाएगी,
ख्वाहिश इतनी है, पैरों तले खून का कतरा भी न हो।

May 29, 2020

अब मतलबी मत समझ लेना तुम मुझे, खुदा गवाह है,
कुछ मतलब के बहाने मेरा बारबार आना, बेमतलब था।

May 28, 2020

अब मेरे पैर जमीं पर चलने के काबिल नहीं,
इश्क़ की सीढ़ियों से गिरता जो आ रहा हूं ।
और गिरना मुमकिन न रहा तब समझा,
अम्मी ने फलक पर बिठाए रखा था ॥

May 28, 2020

जाल-ए-अल्फ़ाज़ तुम्हारा मैं समझ न पाया,
तुम मेरे चांद थे और मैं यकीनन इक सितारा ।

May 28, 2020

कोई पत्थरों के लिए देश परदेश भटकते हैं, पत्थर पर सिर रख हम खाली पेट सोते हैं, घिन्न आती थी जिन्हें हमारे अस्तित्व मात्र से, आज चार कंधों के लिए भटकते देखा है।

May 3, 2020

बचपन से किताबों में खुद को देखने की तमन्ना थी,
शायद जानता था, खुदको खुद से न खोज पाऊंगा ।

Mar 8, 2020

अब खुद ही दीवारें ख़राब कर लेता हूं,
लिख जाते थे उन्हें अब सफाई पसंद है।

Mar 1, 2020

हज़ारों लोगों की जिंदगियां मिलकर बनी थी वह नाव,
इक तूफ़ान में तबाह हो गई, कई और जिंदगियों के साथ ।

Mar 1, 2020

पता तो मैं अपना क्या बताऊं, घुमक्कड़ हूं, लापता हूं,
बचपन का पता दे देता हूं, जहां अब लौट नहीं सकता।

Mar 1, 2020

जिंदगी की किताब में जो पन्नें खाली छूट जाते हैं,
असल जिंदगी उसी में कहीं छूपी रह जाती है।

मैं खुली किताब हूँ शायद।

Mar 1, 2020

वक़्त को भी न जाने क्या क्या दिखलाना बाकी है,
जूठा पानी न पीने वालों ने जूठी कसमें खा ली ।

Feb 28, 2020

सिर पर बिठाया करते थे कभी,
और आज मैं बैठी हूं इक कोने में,
आइने पे चिपकी किसी बिंदिया की तरह।

Feb 24, 2020

किसी की पेंसिल खो‌ गई है सुनकर रो देता था,
अब मौत की ख़बर चाय के साथ पीता है ।
मगर “बेटा, लगी तो नहीं” जो पूछ लिया,
यक़ीनन आंसूओं की नदियां बह जाएगी ॥

Feb 22, 2020

समझना चाहता रहा सबको, और गलत समझा गया है मुझे,
मैंने बस सबकी बात सुनी थी, बेगैरत समझा गया है मुझे ।
कहानियों की खोज में महफूज़ था, गुनहगार माना गया है मुझे,
खुद को अब क्या समझाऊं, हूं नहीं वही समझा गया है मुझे ॥

Feb 22, 2020

बारिश

शायद दीवारों के बाहर भी दर्द दिख रहा होगा,
तभी सफर पर निकले बादल भी थम गए होंगे,
मेरे हालात जान उनकी भी रूह रो दी होगी,

और उनके आंसू भी खिड़की के बाहर से ही,
मेरी बदकिस्मती देख, मिट्टी में मिल गए होंगे,
मेरी वह सारी अधूरी ख्वाहिशों की तरह।

Feb 18, 2020

मोहरे पर मोहरा पहनते रहो, मगर मैं हालात समझता हूं ।
चाहे जैसे भी छुपा दो अल्फाजों में, मैं बात समझता हूं ॥

Feb 16, 2020

शायद हम नासमझ थे, या समझा न पाए उन्हें,
भीगे थे उनके लिए, छींकते भी रहे कुछ दिन तक,
और वह उस सन्नाटे को कुछ और नाम दे आए ।

Feb 15, 2020

हुकूमत भी कुछ आसमां जैसी होती है,
सिर्फ बारिश के वक्त पर चिल्लाती है ।

Jan 20, 2020

आसमान में होने का इतना क्यों है गुरूर,
हर ज़मीं किसी ना किसी आसमां में है ।

Jan 20, 2020

मैं क्यों अपने आप को लोगों के नजरिए से तोलुं ?
अमरूद के पेड़ को आम के पेड़ में बदलते देखा है?

Jan 20, 2020

फासला बनाए रखा सोचकर कि फासले कुछ और न बढ़ जाए।
दोहराता रहता हूं मैं गलतियां कि आदत कहीं वह छूट न जाए॥

आदतें, फासले और गलतियां, बिखरे पेड़ की आख़िरी टहनियां ।

Jan 19, 2020

वैसे तो बह जाना ही स्वभाव है बूंद का,
आज पीले पत्ते पर जो गिरी, ठहर गई ।

Dec 18, 2019

बक्सा ही आखिरी मुकाम है मालूम है लेकिन,
लोग अक्सर किसी ना किसी बक्से में खोए रहते है।

Dec 11, 2019

शाम हुई,
अंधेरे को बढ़ता देख मैंने आंखें बंद कर दी।

आंखें खुलती रही बार-बार, अंधेरा‌ गाढ़ा होता रहा ।
काश शाम को ढूंढ कर लालटेन जला दी होती ॥

Dec 1, 2019

कोलेज में हररोज सिर्फ नाश्ता और किताबें लेकर जाता था।
आखिरी दिन बस्ता जो खोला, सिर्फ ज़िम्मेदारियां निकली ॥

Dec 1, 2019

अम्मी हमेशा मेरी चीजों को इधर-उधर रख देती है।

आज जब सालों बाद घर लौटा तो देखा कि
मेरी किताबों की जगह ईक अनजाने,
थोड़े पुराने दवाईयों के बक्से ने ले रखी है।

मेरी जगह अब भी खाली है॥

Nov 30, 2019

समंदर भला उछलता क्यों न रहे,
मछलियां गुदगुदी जो करती हे,

उन मछलियों जैसी मेरी ख्वाहिशें ।

Nov 8, 2019

शायद यह सच है कि तुम, अपनी सोच से सीमित हो । सोचना यह भी जरूरी है, वह किस बात से सीमित है? बंद कमरे में कैद रह कर भला, दुनिया तुम कैसे समझ लोगे?

Oct 19, 2019

ज़िंदगी भर ग़म में रहने का इंतजाम किए बैठे ।
चराग़ थे, और ख्वाहिशें सितारों की लिए बैठे ॥

Oct 13, 2019

उस १०x१० के कमरे में, न जाने कितनी कहानियां दब गई।
कुछ बीती हुई, कुछ बनती हुई, और कुछ जो बन न पाई ।

कहानियां जो तुम्हारा इंतज़ार देखती रही अंत तक,
उनके मौत के जिम्मेदार अगर तुम नहीं, तो फिर कौन?

Oct 9, 2019

ज़िंदगी में ना जाने क्या मैं ढूंढ़ रहा हूं।
देख नहीं पा रहा या आंखें मूंद रहा हूं ॥
बदलाव चाहिए तो कैसा, नहीं जानता।
पूरी ज़िंदगी जो कलश का बुंद रहा हूं॥

Oct 8, 2019

ख़ुद का ख़ुद से मिलना इतना भी नामुमकिन नहीं,
बारिश की बूंदे क्या सागर से कभी मिलती नहीं?

Sep 22, 2019

कतरा कतरा मैं जुटाता चला, किसी और को लौटाने को ।
लौटा रहा भी हूं तो उसे, जो रहा है पाल सब दरिंदो को ॥

Sep 19, 2019

ओ नादान ज़िंदगी, तुझे अब मैं क्या समझाऊ ?
तू जिससे प्यार करती है, वह वक़्त
बहुतों को तबाह कर चुका है |

Sep 14, 2019

ऊंचाईओ को छूने वाले किसी के सहारों पर नहीं पलते ।
औरों की छांव में बढने वाले पेड़ अक्सर बौने रह जाते है ॥

Jul 29, 2019

उड़ना तो नहीं भूले मगर
अब डर लगता है |
आदम जात बादलों को भी
पानी के लिए गिरा दिया करते हैं ।

Jul 23, 2019

माना थोड़े अजीब है हम, शायद थोड़े बेवफ़ा भी,

Tinder के ज़माने में, हर इतवार
किताबों की दुकान में अपना प्यार खोजने जाते हैं।

Jul 23, 2019

तन्हाई भी मेरी मच्छरदान सी निकली,

होनेवाले हादसों से तो बचाती रही,
मगर हो चुके है उनको भूलने भी ना दिया।

Jul 21, 2019

परिंदे की तरह खुलकर आसमान में उड़ने के मशवरे देने वालों,
कभी उससे भी पूछ लो कि उसके सपने, उड़ने के ही थे क्या ?

Jul 6, 2019

इक समान क्यों ही न हो यह कश्तियां,
मंज़िले हर इक की कुछ और ही रहेगी ।

कुछ साथ के बाद, रास्ते अलग हो जाएंगे शायद,
मगर कहानियां सुनाती अंत में यहीं पर मिलेगी ॥

Jun 9, 2019

काफी वक़्त बाद मैंने अपने घर में पैर रखे।
एहसास हुआ कि घर की व्याख्या,
दिल बहलाने बदल रखी थी कुछ सालों से।

May 19, 2019

शायद अभी थोड़ा और वक्त लगेगा, चलो वक्त की रवानी सुनाता हूं ।
किस्से तो कहीं सुने होंगे, पर आज नई ईक तरफा प्यार की कहानी सुनाता हूं ॥

मुझे खींच कर कैसे ले गई, उस जवानी की शैतानी सुनाता हूं ।
कभी जो मेरा हुआ करता था, मासूम बचपन की कहानी सुनाता हूं ॥

Apr 14, 2019

जिंदगी की आख़िरी सांस कुछ नहीं मेघधनुष के बाद का स्याह रंग है ।
कयामत भी कुछ नहीं, हकीकत और तुम्हारे सारे मलाल के बीच छिड़ी जंग है ॥

Mar 31, 2019

इंतकाम, मेरे सारे ईम्तिहान जैसा ही रहा ।
आनेवाला कुछ और था, मैं कुछ और पढ़ता रहा ॥

Mar 16, 2019

दादी की जो कहानियां सुनने मैं पूरा दिन अच्छा बना रहता था ।
शायद वह राक्षस मैं ही था, जो सपनों को कैद रखता है ॥

Mar 9, 2019

जन्मदिन का मातम हर साल होना चाहिए?
ज़िंदा होने का भी मुझे मलाल होना चाहिए?

दुनिया में रंग भरने की नाकाम कोशिश के खातिर,
चाहता हूँ की कफ़न भी हरा लाल होना चाहिए।

Feb 25, 2019

मैं अहमियत समझकर भी नज़ाकत नहीं समझता,
जानकर भी न जानने की मेरी कला नहीं समझता ।

जब तक थोड़ा न रहे वक्त की ताकत नहीं दिखती,
कुछ नहीं कर जो पाता हूं मैं ख़ुद नहीं समझता ॥

Feb 25, 2019

ख़ुदा से भला क्या मांगना, गर सोचो तो तरस आता है ।
जब दुनिया रास नहीं आती, तब आदमी जहां बनाता है॥

Feb 24, 2019

मैं ठहरा आग सा, तू पानी सी

अपनी कहानी ख़त्म अपने-आप हो गई ।
मैं आग सा ही रहा मगर तू भांप हो गई ॥

Feb 24, 2019

आज मैं बग़ीचे गया था जहां हम झूला करते थे।
वह टहनी भी जुदा हो गई है पेड़ से, कुछ हमारी तरह॥

Feb 18, 2019

शौक़ था दफ़्तर के कुएं में कूदने का।

अंजाम फिर वही हुआ,
मैं उसमें उतरता रहा और वह मुझमें ॥

Feb 14, 2019

3-2-4

बारिश की बूंदे
भिगाती रही,
डूबा दिल और रुमाल ।

Feb 14, 2019

तुम्हारे जूठे ईश्क को भी बखूबी निभा लेगा वो,
जूठा खाना, पहनना, बचपन से आदत सी है।

Feb 14, 2019

दरवाजे खूले छोड़ दिल के, कभी जल्दी भी सो जाया करो।
जायदाद नहीं रही पर फ़कीरी के भी अपने फायदे होते हैं ॥

Feb 14, 2019

गवाह हूं कि ख़ुदा ने ज़हां अधूरा ही छोड़ दिया है ।
जिंदगी में कुछ भी मुकम्मल कहां हुआ है हमसे॥

Feb 5, 2019

बचपन में माँ चीनी के डब्बे में पैसे रखा करती थी,
शायद दुगने होते थे वहां, या शायद मीठे ।

बारिश आई इक दिन तो पता चला,
की नम भी हो जाते है, और आँखों को भी कर देते है ।

उस रात सोचता रहा, की पैसे भी नम हो सकते है अगर,
पैसेवाली गाड़ियों में बारिश पहुँचने की देर हे क्या?

Jan 22, 2019

खत आखरी है यह मेरा, जलाकर दफ़्न कर देना।
चलता हूं, शैतान-ए-मज़हब के लिए जश्न रख लेना॥

Jan 22, 2019

अब्बा सच कहते थे कि बेवफा निकलोगे,
मेरे सामने मौत को बांहों में लेकर चल दिए।

काश, इतना बताकर जाते कि तुम्हें
उससे अब्बा ने मिलवाया था क्या?

Jan 20, 2019

मेरे लिए, सर्द मौसम का मतलब तुम्हारे जैकेट में मेरा छिप जाना ।
आज कल ठंड तो होती है, लेकिन मौसम लापता है॥

Jan 15, 2019

सीढ़ी पर सीढ़ी रख चढ़ता रहा, वह हटाते रहे सीढ़ियां नीचे से
क्या वह चाहते हैं कि मैं गिर जाऊं, या कभी वापस नीचे न जा पाऊं?

Dec 29, 2018

कि क्यों ईक टुटे शीशे से घर झांकना चाहते हो।
चुल्लू भर पानी से दरिये को नापना चाहते हो॥

Dec 10, 2018

मुझे समझने की कोशिश भी मत करना,
मैं वह नहीं करता जो मैं चाहता हूं।

मैं करता हूं जो करना जरूरी है।

करना तो बहुत कुछ जरूरी है,
तो मैं करता हूं जो मैं चाहता हूं।

Dec 10, 2018

साबित क्यों करें खुद को, कुछ कैद पंछियों के आगे?
हुनर दिखलाने, जब सारा जहां पड़ा हैं।

Nov 25, 2018

घर ऐसी बरसात है कि कितना भी भीग जाओ,
सूखे रह जाने का गिला रह ही जाता है।

Nov 12, 2018

कुछ परिंदे ज़मीन से दूर रहें तो अच्छा है।
चींटियां शहद में कूद अपनी मर्ज़ी से जाती है॥

Nov 6, 2018

चाहे इकलौता गुलाब हो या हो गुलदस्ता, बस एक जरिया है चमन को याद करने का । काश कोई यह बात समझा दे उनको, जो हर लम्हें को तस्वीरों में बांट देते हैं ॥

Nov 3, 2018

मासूम दुआ करते हैं जिंदगी में रंग भरने की तुझसे ।
जो खुद उब जाने पे यह कमबख्त जहां बना बैठा॥

Oct 22, 2018

क्यों हर चीज को पैसों में तोलते हो?

अठन्नी के बचपन के खिलौने, लाखों में भी नहीं मिलते।

Oct 4, 2018

की गई अच्छी बुरी चीजें बस साथ रह जाती है,
लिखी बातों की अगले पन्नो पे भात रह जाती है।

मासूम हवा के झोंके वापिस पन्नों को ताजा कर देते हैं,
और एहसास होता है कि वह अज़ीज़ पन्ने अब, काफी पीले पड़ चुके हैं॥

Oct 1, 2018

लगता है किताबों ने भी नए दोस्त बना लिए हैं।
अब पास जाकर बैठो तो नींद को बुला लेती है॥

Sep 29, 2018

निकला हूं ज़ख्मी, नमक के शहर में ।
प्यास भी लग गई, बाढ़ भी आई है ॥

Sep 28, 2018

खानाबदोशों से पूछो कि सफ़र क्या होता है।
पिंजरे में कूद लिखते हो कि उड़ना तुम्हें पसंद है॥

Sep 2, 2018

बस भी करो डराना मुझे, छिन जाने के किस्सों से।
पसंदीदा खिलौना मैं जानबूझ कर खोया हूं॥

Sep 1, 2018

बोझ ज्यादा है कंधों पर, थोड़ा आराम चाहिए,
गनीमत है, मौत का त्योहार ज्यादा दूर नहीं।

न जाने क्यों छुट्टियों के इंतजार में रहते हैं, जानते हुए कि काम के हो या फिर छुट्टी के, दिन अपनी जिंदगी के खत्म हो रहे है।

Jul 1, 2018